प्रदीप कुमार गांगले
जिस खेल महोत्सव का उद्देश्य खिलाड़ियों को प्रोत्साहन, सम्मान और अवसर देना था, वही आयोजन अंततः खिलाड़ियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाला मंच बन गया। भव्य शुरुआत के बाद समापन समारोह में जो हुआ, उसने खेल प्रेमियों और अभिभावकों—दोनों को निराश किया।
जीतने वाली टीमों को सम्मानित करने के बजाय पूरी टीम को मंच से दूर रखा गया, केवल औपचारिकता निभाने के लिए कैप्टन को बुलाया गया। यह न केवल खिलाड़ियों के परिश्रम का अपमान है, बल्कि टीम स्पिरिट की मूल भावना के भी खिलाफ है।
खिलाड़ियों का आक्रोश—अपमान के विरुद्ध विरोध
खिलाड़ियों का विरोध कोई अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि सम्मान की माँग थी।
मेडल फेंकना और प्रमाण पत्र फाड़ना इस बात का प्रतीक है कि खिलाड़ी इनाम से अधिक इज्जत चाहते हैं। जिन प्रमाण पत्रों पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की तस्वीरें छपी थीं, उनका इस तरह अपमान होना शासन-प्रशासन के लिए भी आत्ममंथन का विषय है—क्योंकि गलती खिलाड़ियों की नहीं, व्यवस्था की है।
नगद पुरस्कार में भेदभाव—खिलाड़ियों के साथ अन्याय
खरगोन में नगद पुरस्कार न मिलना और बड़वानी में उसी आयोजन के तहत खिलाड़ियों को नगद राशि देना सीधा-सीधा भेदभाव दर्शाता है।
यदि संसाधनों की कमी थी, तो सभी जिलों में समान नियम क्यों नहीं अपनाए गए?
खिलाड़ियों से वादा किया गया पुरस्कार देना कोई दया नहीं, उनका अधिकार है।
राजनीति नहीं, खिलाड़ी केंद्र में हों
खेल महोत्सव को राजनीतिक मंच बनाने या किसी को नीचा दिखाने का साधन बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है। खेल राजनीति से ऊपर होता है और खिलाड़ी किसी भी राजनीतिक खींचतान के मोहरे नहीं हो सकते।
खिलाड़ियों की मांगें स्पष्ट हैं—
जीती हुई पूरी टीम का सार्वजनिक सम्मान
घोषित नगद पुरस्कार का तत्काल भुगतान
आयोजन में हुई अव्यवस्थाओं की जांच
भविष्य में खिलाड़ियों के सम्मान को लेकर स्पष्ट व पारदर्शी नीति
खिलाड़ी बोले—
“हमें मेडल नहीं, सम्मान चाहिए।
वादा निभे, यही हमारी जीत है।”
यह मामला चेतावनी है कि यदि खिलाड़ियों की मेहनत और भावना का सम्मान नहीं किया गया, तो ऐसे आयोजन खेल को बढ़ावा नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को हतोत्साहित करेंगे।



