जाने हम सड़क के लोगों से महलों वाले क्यों जलते हैं
प्रदीप कुमार गांगले
“:हर साल 14 अप्रैल आते ही पूरे देश में एक अलग ही माहौल बन जाता है। जगह-जगह मंच सजते हैं, बैनर-पोस्टर लगते हैं, रैलियां निकलती हैं और डॉ. भीमराव अंबेडकर के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है। “जय भीम” के नारों के बीच बाबा साहब के विचारों और उनके द्वारा बनाए गए संविधान की बातें बड़े जोर-शोर से की जाती हैं।लेकिन इस पूरे उत्साह के बीच एक सवाल हर बार खड़ा हो जाता है—क्या यह सब सच्ची श्रद्धा है, या सिर्फ एक दिन का दिखावा?14 अप्रैल के दिन वही लोग, जो पूरे साल बंगलों और हवेलियों की सीमाओं में सिमटे रहते हैं, अचानक मलिन बस्तियों और झोपड़ियों की ओर रुख करते हैं। वहां जाकर गरीब और मजदूरी करने वाले लोगों के बीच बैठते हैं, उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं, लंबे-लंबे भाषण देते हैं और खुद को बाबा साहब का अनुयायी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते।मंचों से संविधान की बातें होती हैं, समानता की बातें होती हैं, अधिकारों की बातें होती हैं—लेकिन क्या इन बातों का असर उन लोगों की जिंदगी में कहीं दिखाई देता है, जिनके नाम पर ये कार्यक्रम किए जाते हैं?बाबा साहब ने अपना पूरा जीवन उस समाज के लिए समर्पित कर दिया, जो शोषित, वंचित और पिछड़ा हुआ था। उन्होंने केवल अधिकारों की बात नहीं की, बल्कि उन अधिकारों को पाने के लिए संघर्ष भी किया। उन्होंने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार बताया, आत्मसम्मान को जीवन का आधार बनाया और समानता को समाज की नींव रखने की कोशिश की।लेकिन आज, 14 अप्रैल का दिन कई जगहों पर केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। एक दिन के लिए झोपड़ियों में जाना, दो-चार घंटे वहां बिताना, कुछ नारे लगाना और फिर वापस अपनी सुविधाओं की दुनिया में लौट जाना—क्या यही बाबा साहब के विचारों का सम्मान है?अगर वास्तव में बाबा साहब को मानना है, तो यह दिखावा बंद करना होगा। उनके विचारों को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखना होगा, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारना होगा। झोपड़ियों में जाकर भाषण देने से ज्यादा जरूरी है वहां के लोगों के लिए शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन की व्यवस्था करना।आज का युवा भी इस फर्क को समझने लगा है। वह यह जान चुका है कि असली बदलाव मंचों से नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर काम करने से आता है। बाबा साहब की जयंती सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि एक संकल्प का दिन होना चाहिए—एक ऐसा संकल्प, जिसमें हम यह तय करें कि हम उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए क्या कर रहे हैं।समाज को यह समझना होगा कि “जय भीम” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी है हर उस व्यक्ति तक न्याय और समानता पहुंचाने की, जो आज भी इसके लिए संघर्ष कर रहा है।अंत में यही कहा जा सकता है कि 14 अप्रैल को अगर हम सच में बाबा साहब को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो हमें दिखावे से ऊपर उठकर उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना होगा। तभी यह जयंती सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक सच्चे परिवर्तन की शुरुआत बन पाएगी।



