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समरसता के दावों पर सवाल: खरगोन में धार्मिक आयोजनों से दलित-आदिवासी दूरी क्यों?”

प्रदीप कुमार गांगले


📍 खरगोन
खरगोन । जिले में सामाजिक समरसता के दावे अब सवालों के घेरे में नजर आने लगे हैं। एक ओर जहां “समरसता” के नाम पर बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित किए गए, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। हालात यह हैं कि जिला मुख्यालय सहित कई स्थानों पर धार्मिक आयोजन, भंडारे और यात्राएं अब वर्ग विशेष तक सीमित होती दिखाई दे रही हैं।
सूत्रों के मुताबिक, खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाले कई बड़े नाम इन आयोजनों में केवल अपने ही वर्ग के लोगों को आमंत्रित कर रहे हैं। इससे समाज में विभाजन की भावना और गहरी होती जा रही है। खासतौर पर दलित और आदिवासी समुदाय खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
जब इस मुद्दे पर जिले के सत्ताधारी नेताओं से सवाल किया गया, तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर इसे “निजी कार्यक्रम” बताते हुए पल्ला झाड़ लिया। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि वे इस विषय पर बात करेंगे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सामाजिक और धार्मिक आयोजनों को निजी बताकर जिम्मेदारी से बचा जा सकता है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जहां धार्मिक आयोजन पूरे समाज के मेल-मिलाप और एकजुटता का प्रतीक होते थे, वहीं अब उनमें वर्ग विशेष का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कई स्थानों पर यह भी देखने में आया कि भंडारों और यात्राओं में दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों की भागीदारी या तो बेहद कम रही या उन्हें अलग-थलग रखा गया।
गौरतलब है कि कुछ समय पहले जिले भर में “हिंदू समरसता सम्मेलन” आयोजित किए गए थे, जिनका उद्देश्य समाज को एकजुट करना बताया गया था। लेकिन उसी के बाद राम नवमी और हनुमान जन्मोत्सव जैसे बड़े धार्मिक पर्वों पर जिला मुख्यालय में आयोजित भंडारों और यात्राओं में दलित-आदिवासी समुदाय की भागीदारी सीमित होती नजर आई।

सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में समान भागीदारी नहीं होगी, तो “समरसता” जैसे शब्द केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रह जाएंगे। असली समरसता तभी संभव है, जब हर वर्ग, हर समाज और हर व्यक्ति को समान सम्मान और अवसर मिले।
⚠️ बड़ा सवाल:
क्या समरसता सिर्फ मंचों और भाषणों तक सीमित है?
या फिर जमीनी स्तर पर समाज फिर से वर्गों में बंटता जा रहा है?
अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और समाज के नेतृत्वकर्ता इस गंभीर मुद्दे पर क्या ठोस कदम उठाते हैं, या फिर “समरसता” केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।

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