प्रदीप कुमार गांगले
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मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था इन दिनों एक गहरे संकट से गुजर रही है। बार-बार बदलते पाठ्यक्रम, यूनिफॉर्म और सिलेबस के नाम पर जिस तरह से अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जा रहा है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि एक सुनियोजित “शिक्षा लूट मॉडल” की ओर इशारा करता है। सवाल सीधा है—क्या शिक्षा अब बच्चों का अधिकार नहीं, बल्कि बाजार का उत्पाद बन चुकी है?
हर साल नया सत्र शुरू होते ही अभिभावकों के सामने “नए नियमों” का पहाड़ खड़ा कर दिया जाता है। कभी यूनिफॉर्म बदलने का फरमान, तो कभी किताबों के नए सेट का दबाव। निजी स्कूलों की मनमानी इस कदर बढ़ चुकी है कि वे खुलेआम अभिभावकों को निर्धारित दुकानों से ही महंगी किताबें और ड्रेस खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। यह सीधा-सीधा कमीशन का खेल है, जिसमें शिक्षा का स्तर नहीं, मुनाफा प्राथमिकता बन चुका है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार इस पूरे खेल की मूकदर्शक बनी हुई है। शिक्षा विभाग के नियम कागजों में सख्त दिखते हैं, लेकिन जमीन पर उनकी धज्जियां उड़ती नजर आती हैं। निजी स्कूल प्रबंधन “नीति” के नाम पर अपनी जेबें भर रहे हैं और गरीब-मध्यम वर्गीय परिवार इस बोझ तले दबते जा रहे हैं।
क्या यही “नया भारत” है, जहां एक मजदूर का बच्चा सिर्फ इसलिए अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाए क्योंकि उसके माता-पिता हर साल बदलती किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने में असमर्थ हैं? क्या शिक्षा का अधिकार केवल अमीरों तक सीमित रह जाएगा?
जरूरत है कि मध्य प्रदेश सरकार अब दिखावे की बैठकों और घोषणाओं से आगे बढ़े और जमीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई करे।
निजी स्कूलों की फीस और सामग्री पर सख्त नियंत्रण लागू किया जाए
हर साल यूनिफॉर्म और किताबें बदलने पर रोक लगे
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार किया जाए
शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सेवा का माध्यम बनाया जाए
आज प्रदेश का आम नागरिक पूछ रहा है—सरकार कब जागेगी?
कब शिक्षा माफियाओं पर लगाम लगेगी?
कब बच्चों का भविष्य “बाजार” से निकलकर “अधिकार” बनेगा?
यदि अब भी सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में शिक्षा केवल एक महंगा सौदा बनकर रह जाएगी, जहां ज्ञान नहीं, पैसों की ताकत भविष्य तय करेगी।
यह समय है निर्णायक कार्रवाई का—वरना इतिहास माफ नहीं करेगा।



