प्रदीप कुमार गांगले
खरगोन जिले की जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित की ठिबगांव शाखा में सामने आया 41 लाख 58 हजार रुपये का गबन अब केवल एक बैंक शाखा की अनियमितता नहीं, बल्कि पूरे सहकारी बैंकिंग तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल बनकर खड़ा हो गया है। किसानों, मजदूरों और गरीब खाताधारकों की मेहनत की जमा पूंजी आखिर कितनी सुरक्षित है, यह सवाल अब हर व्यक्ति की जुुबान पर है।
जानकारी के अनुसार 25 मई 2026 को शाखा में नियमित कैश मिलान एवं भौतिक सत्यापन के दौरान बैंक रिकॉर्ड और वास्तविक नगद राशि में भारी अंतर पाया गया। जांच में कुल ₹41,58,095 की नगद कमी सामने आई। मामले ने उस समय और सनसनीखेज रूप ले लिया जब शाखा में पदस्थ कैशियर रितु गोयल अचानक दोपहर बाद गायब हो गईं और उनका मोबाइल फोन भी बंद मिला। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को सीधे-सीधे वित्तीय घोटाले और सुनियोजित गबन की दिशा में खड़ा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी रकम महीनों तक शाखा से कैसे गायब होती रही और किसी अधिकारी को भनक तक नहीं लगी? बैंकिंग नियमों के अनुसार लाखों रुपये की नगद राशि का प्रतिदिन मिलान, संयुक्त सत्यापन और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा निरीक्षण अनिवार्य होता है। फिर भी यदि 41 लाख से अधिक की राशि गायब हो गई तो यह केवल एक कर्मचारी की करतूत नहीं बल्कि शाखा स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक की गंभीर लापरवाही, संदिग्ध कार्यप्रणाली और संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
सूत्रों का कहना है कि शाखा में लंबे समय से नियमों को ताक पर रखकर कार्य किया जा रहा था। यदि समय रहते जांच नहीं होती तो यह घोटाला और लंबे समय तक दबा रह सकता था। अब यह भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या बैंक प्रबंधन की निगरानी केवल कागजों तक सीमित थी? क्या जिम्मेदार अधिकारी नियमित निरीक्षण के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभा रहे थे?
मामले की गंभीरता को देखते हुए बैंक की मुख्य कार्यपालक अधिकारी संध्या रोकड़े ने कैशियर रितु गोयल एवं सहायक गणक (वाल टेलर) त्रयम्बक वाणी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। शाखा में पंचनामा तैयार कर पुलिस थाना जैतापुर को सूचना दी गई है तथा विभागीय जांच प्रारंभ कर दी गई है।
वहीं शाखा प्रबंधक राजेश राठौड़ का बयान भी सवालों के घेरे में आ गया है। उन्होंने पूरे मामले पर केवल इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “जांच के लिए पुलिस में आवेदन दे दिया गया है।” लेकिन अब आम जनता यह पूछ रही है कि क्या केवल आवेदन देकर जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? आखिर शाखा में प्रतिदिन होने वाले कैश सत्यापन, निगरानी और वित्तीय नियंत्रण की जवाबदेही किसकी थी? यदि शाखा प्रबंधन समय पर सतर्क रहता तो क्या इतनी बड़ी रकम गायब हो पाती?
जनता अब केवल निलंबन की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। क्षेत्र में यह मांग तेज हो रही है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए, शाखा के पिछले कई वर्षों के लेन-देन और ऑडिट रिकॉर्ड खंगाले जाएं तथा उन अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई हो जिन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया।
लोगों का कहना है कि यदि गरीब किसानों के ऋण की एक किश्त बकाया रह जाए तो बैंक तत्काल नोटिस और कुर्की की कार्रवाई शुरू कर देता है, लेकिन जब बैंक के भीतर लाखों रुपये का गबन हो जाता है तो जिम्मेदार अधिकारी केवल आवेदन और जांच की बात कहकर बचने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। यह दोहरा रवैया अब आम जनता के बीच भारी आक्रोश का कारण बन रहा है।
फिलहाल पुलिस और विभागीय जांच जारी है, लेकिन यह मामला सहकारी बैंकिंग व्यवस्था में फैली अव्यवस्था, कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी की पोल खोलता नजर आ रहा है। जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर उनकी मेहनत की जमा पूंजी की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और इतने बड़े घोटाले का असली मास्टरमाइंड कौन है?
सहकारी बैंक में 41.58 लाख का महाघोटाला, जिम्मेदार कौन?कैशियर फरार, मोबाइल बंद… क्या बिना संरक्षण के संभव है इतनी बड़ी वित्तीय लूट?
RELATED ARTICLES



