दुकानों के नाम पते बताने के बाद भी अनजान बनता विभाग
प्रदीप कुमार गांगले
खरगोन जिले सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों तथाकथित “5G कपास” के नाम पर गुजरात और महाराष्ट्र से अवैध रूप से बीजों की बंपर सप्लाई हो रही है। खुलेआम गांव-गांव और खेत-खेत यह कारोबार फल-फूल रहा है, लेकिन कृषि विभाग अब भी केवल कागजी कार्रवाई और खानापूर्ति तक सीमित नजर आ रहा है। हालात यह हैं कि किसान आज भी कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय सलाह पर नहीं, बल्कि व्यापारियों और दलालों के भरोसे खेती करने को मजबूर हैं। जबकि विभाग के अधिकारियों को दुकानों गोडाउन के पते भी बता दिए गए हैं कि यह सब समान कहा रखा गया है ।
सूत्रों के अनुसार बिना प्रमाणित और संदिग्ध गुणवत्ता वाले कपास बीज ऊंचे दामों पर किसानों को बेचे जा रहे हैं। बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं कि यह बीज अधिक उत्पादन देगा, कीटों से बचेगा और किसानों को मालामाल कर देगा। लेकिन जब फसल खराब होती है, उत्पादन घटता है या बीमारियां फैलती हैं, तब यही व्यापारी गायब हो जाते हैं और पूरा नुकसान किसान को झेलना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सीमावर्ती राज्यों से इतनी बड़ी मात्रा में अवैध बीज जिले में पहुंच कैसे रहा है? क्या कृषि विभाग, मंडी प्रशासन और संबंधित अधिकारी पूरी तरह आंखें मूंदकर बैठे हैं? गांवों में खुलेआम वाहन भर-भरकर बीज बिक रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल छोटे-मोटे दिखावटी छापे मारकर फाइलें बंद कर दी जाती हैं।
किसानों का कहना है कि विभाग के अधिकारी केवल प्रेस नोट और बैठकों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर अवैध कारोबारियों का नेटवर्क लगातार मजबूत होता जा रहा है। यदि समय रहते इस पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो हजारों किसानों की मेहनत और करोड़ों रुपये दांव पर लग सकते हैं।
यह भी आशंका जताई जा रही है कि इस पूरे खेल में कुछ प्रभावशाली लोगों का संरक्षण प्राप्त है, तभी बिना रोक-टोक यह गोरखधंधा वर्षों से चलता आ रहा है। प्रशासन यदि सच में गंभीर है तो केवल कागजों में कार्रवाई दिखाने के बजाय सीमाओं पर जांच चौकियां सक्रिय करे, अवैध बीज गोदामों पर बड़े स्तर पर छापेमारी करे और दोषियों पर एफआईआर दर्ज कर जेल भेजे।
अब किसान भी पूछने लगे हैं — आखिर कब तक नकली और अवैध बीजों के नाम पर उनकी जिंदगी से खिलवाड़ होता रहेगा? यदि जल्द सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में किसान सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और कृषि विभाग की होगी।



