HomeUncategorizedदलित-आदिवासियों पर कहर: फाइलों में दफन इंसाफ, शर्मनाक खामोशी बेनकाब

दलित-आदिवासियों पर कहर: फाइलों में दफन इंसाफ, शर्मनाक खामोशी बेनकाब


✍️ प्रदीप कुमार गांगले
खरगोन। जिले में दलित और आदिवासी समाज पर हो रहे अत्याचार अब केवल घटनाएं नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और संवेदनहीनता का जीवंत सबूत बन चुके हैं। हालात इतने भयावह हैं कि पीड़ित इंसाफ की गुहार लगाते-लगाते थक चुके हैं, लेकिन जिम्मेदार तंत्र अब भी चुप्पी साधे बैठा है।
एक चौंकाने वाली घटना जिसमें पुलिस विभाग के एक आरआई द्वारा अपने ही कर्मचारी को कुत्ते के बेल्ट से बेरहमी से पीटने का आरोप है। यह घटना सिर्फ मारपीट नहीं, बल्कि वर्दी के नाम पर सत्ता के दुरुपयोग की हद को दर्शाती है। मामला सड़कों पर भी आया पर परिवार आज भी न्याय की गुहार लगा रहा हैं।
वहीं, एक गरीब खेतिहर मजदूर को केवल छुट्टी मांगने की “गलती” पर लोहे की रॉड से पीटा गया। सवाल यह है कि क्या इस देश में गरीब और दलित होना ही सबसे बड़ा अपराध बन गया है?
इतना ही नहीं—मंदिरों में प्रवेश पर धमकाना गाली गलौज कर धमकाना रोकना, वही शराब माफिया द्वारा कुचलन अधमरी हालात में भी आज भी न्याय मांगना और भी ऐसे कई मामले घटनाएं भी सामने आई हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि अत्याचार अब एक पैटर्न बन चुका है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन गंभीर मामलों को कार्रवाई की बजाय “जांच” के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। फाइलें दबा दी गईं, और जिम्मेदार अधिकारी समय काटने में जुटे नजर आए।
पीड़ित परिवार न्याय की आस में दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन उन्हें हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है। दूसरी ओर, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन भी इस मुद्दे पर चुप हैं—न विधानसभा में आवाज, न लोकसभा में सवाल।
सूत्र यह भी बताते हैं कि कुछ प्रभावशाली लोग पीड़ितों पर समझौते का दबाव बना रहे हैं। अगर यह सच है, तो यह लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला है।
यह पूरा मामला साफ संकेत देता है कि सिस्टम कहीं न कहीं दोषियों के साथ खड़ा नजर आ रहा है।
👉 अब सबसे बड़ा सवाल:
कब मिलेगा दलित-आदिवासियों को न्याय?
कब तक फाइलों में दफन रहेगा सच?

RELATED ARTICLES

Most Popular